नया संसद भवन जन जननी जन्मभूमि का नवमंदिर देवतत्व का प्रतीक है - बी.के. शर्मा

नया संसद भवन जन जननी जन्मभूमि का नवमंदिर देवतत्व का प्रतीक है - बी.के. शर्मा

विश्व ब्रह्मर्षि ब्राह्मण महासभा के संस्थापक अध्यक्ष ब्रह्मर्षि विभूति बीके शर्मा हनुमान ने बताया कि  आज संसद परिसर में राष्ट्र को समर्पित किया जा रहा नया भवन आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक है, साथ ही साथ यह बदलते वैश्विक परिवेश में भारत की शक्ति और स्थिति को भी रेखांकित करता है। यह संसदीय भवन भारत के लोगों की सामूहिक आशाओं, आकांक्षाओं और लोकतांत्रिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। अमृतकाल में इसकी प्रतिष्ठा इस आशा के अनुरूप ही है।
संसद का नया भवन भारतीय सभ्यता में गहराई से रचे-बसे लोकतांत्रिक मूल्यों की जीवंतता और अमरता का प्रतीक है। 2019 में शुरू की गई सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के हिस्से के रूप में इसका निर्माण प्रारंभ हुआ। यह त्रिकोणीय भवन विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र, जो सदैव अग्रगामी और गतिशील है, की जरूरतों के अनुरूप है। इसका त्रिकोणीय विन्यास कई धर्मों और मान्यताओं से जुड़ी पवित्रता को भी अभिव्यक्त करता है। दो त्रिकोणों वि का मिलन ईश्वरीय इच्छा और मानव प्रयास के संयुक्त रूपक को खूबसूरती से अभिव्यक्त करता है। यह उस देवत्व का प्रतीक है, जिसमें सं मानवीय संवेदनाएं अपना स्थान पाती हैं।

मंगलमय प्रवेश के द्वार

संसद के नए भवन में छह प्रवेश द्वार हैं जिनमें से प्रत्येक द्वार को बलुआ पत्थर से बनी मूर्तियों से सुसज्जित किया गया है। वास्तव में यह मूर्तियां भारतीय सभ्यता व संस्कृति में मान्य शुभ फलदायक जीवधारियों का चित्रण हैं जो सफलता, कीर्ति, शक्ति, विजय, ऊर्जा और ज्ञान के प्रतीक हैं। इनके नाम इन्हीं प्राणियों के नाम पर गज-द्वार, अश्व-द्वार, गरुड़-द्वार, हंस-द्वार, मकर-द्वार और शार्दूल-द्वार रखे गये हैं। नए भवन में तीन उत्सव मंडप हैं।

इनमें चाणक्य, गार्गी, गांधी, पटेल, अंबेडकर, नालंदा एवं कोणार्क चक्र की विशाल पीतल की मूर्तियां हैं जो संकल्प, मान और कर्तव्य मंडप के रूप में भारत की लोकतांत्रिक और संवैधानिक विरासत की साक्ष्य हैं। यहां सार्वजनिक प्रवेश द्वार 'कर्तव्य 'द्वार' तीन दीर्घाओं की ओर ले जाता है जहां भारतीय कला, वास्तु कला, सौंदर्यशास्त्र, इतिहास, विरासत और कला का समेकित रूप देखने को मिलता है। सामूहिक रूप से ये दीर्घाए भारतीय संस्कृति और सभ्यता में निहित भारतीय पहचान और लोकाचार का प्रतिनिधित्व करती हैं। देश के हर हिस्से से स्वदेशी व मूल कलारूपों का समावेश करते हुए इन दीर्घाओं में सभी की साझा दृष्टि और महत्वाकांक्षा को मूर्त रूप देने का प्रयास किया गया है। सौभाग्य की बात यह है कि देश ही नहीं विदेश भी इसका साक्षी रहेगा